Noida: युवाओं में बढ़ रही गठिया और ऑटोइम्यून की बीमारी, 40 साल से कम उम्र के मरीजों की संख्या ज्यादा
यथार्थ अस्पताल की ओपीडी के आंकड़े भी इस ओर ध्यान दिलाते हैं। अस्पताल में गठिया संबंधी समस्याओं के लिए आए 64 मरीजों में से 32 मरीज यानी 50 प्रतिशत की उम्र 40 साल से कम थी।

गठिया को आमतौर पर बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारी माना जाता है, लेकिन अब युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। रूमेटॉइड आर्थराइटिस और अन्य ऑटोइम्यून बीमारियां 20 से 30 साल की उम्र में भी हो सकती हैं। यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के विशेषज्ञों के अनुसार, अस्पताल की ओपीडी में गठिया संबंधी समस्याओं के लिए आए 64 मरीजों में से 32 यानी 50 प्रतिशत की उम्र 40 साल से कम थी। वहीं, क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी की ओपीडी में आने वाले करीब 70 से 75 प्रतिशत मरीज इसी आयु वर्ग के हैं।
विश्व गठिया दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने लोगों को बीमारी के शुरुआती लक्षणों के प्रति जागरूक करते हुए समय पर जांच और उपचार कराने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि जोड़ों में लगातार दर्द, सूजन और सुबह उठने के बाद लंबे समय तक जकड़न रहना गठिया के संकेत हो सकते हैं। कई बार लोग इन्हें सामान्य थकान या मांसपेशियों का दर्द समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे बीमारी की पहचान में देरी हो सकती है।
यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के कंसल्टेंट रूमेटोलॉजी एवं क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी डॉ. इसरारुल हक ने बताया कि गठिया अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है। लगातार लक्षण बने रहने पर विशेषज्ञ से परामर्श लेना जरूरी है। समय पर जांच और सही उपचार से जोड़ों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। उन्होंने बिना चिकित्सकीय सलाह के लंबे समय तक दर्द निवारक दवाओं का इस्तेमाल नहीं करने की भी सलाह दी।
28 साल के मरीज में मिला रूमेटॉइड आर्थराइटिस
यथार्थ अस्पताल, ग्रेटर नोएडा के कंसल्टेंट ऑर्थोपेडिक्स डॉ. सचिन शर्मा ने बताया कि उनके पास 28 साल का एक मरीज दोनों हाथों की उंगलियों और कलाई में दर्द व सूजन की शिकायत लेकर आया था। मरीज को सुबह उठने पर जोड़ों में लंबे समय तक जकड़न रहती थी। जांच में रूमेटॉइड आर्थराइटिस की पुष्टि हुई। उन्होंने बताया कि यदि सुबह उठने पर 30 मिनट से अधिक समय तक जोड़ों में जकड़न रहे या दर्द और सूजन लगातार बनी रहे, तो विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऑटोइम्यून बीमारियों में शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली अपने ही ऊतकों पर हमला करने लगती है। इससे जोड़ों के अलावा त्वचा, फेफड़ों, किडनी और नर्वस सिस्टम पर भी असर पड़ सकता है। रूमेटॉइड आर्थराइटिस के अलावा न्यूरोसाइकियाट्रिक एसएलई और वास्कुलाइटिस जैसी बीमारियां भी कम उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती हैं।
यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा एक्सटेंशन की कंसल्टेंट क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी डॉ. कृति किशोर ने बताया कि उनकी ओपीडी में आने वाले करीब 70 से 75 प्रतिशत मरीज 40 साल से कम उम्र के हैं। उन्होंने 15 से 16 साल की एक लड़की का उदाहरण देते हुए बताया कि वह खून की कमी, बुखार, दौरे पड़ने और परिवार के सदस्यों को पहचानने में परेशानी जैसी समस्याओं से पीड़ित थी।
जोड़ों में लगातार दर्द, सूजन, सुबह की जकड़न या लंबे समय तक बुखार जैसे लक्षण दिखने पर खुद से दवा लेने के बजाय डॉक्टर से परामर्श लें। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ वजन बनाए रखना भी जरूरी है। समय पर जांच, उचित उपचार और नियमित फॉलो-अप से बीमारी की गंभीर जटिलताओं का जोखिम कम करने और सक्रिय जीवन बनाए रखने में मदद मिल सकती है।




