Trump के टैरिफ से भारत का शेयर बाजार डूबा: फार्मा और फर्नीचर सेक्टर में हड़कंप

नोएडा : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर नई टैरिफ नीति लागू करने की घोषणा की है, जिससे भारतीय शेयर बाजार में गिरावट देखने को मिली और निवेशकों में चिंता बढ़ गई। ट्रंप ने फार्मास्युटिकल उत्पादों पर 100% और फर्नीचर पर 50% टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। इस फैसले से भारत के अमेरिका में कारोबार करने वाली कंपनियों को बड़ा झटका लगने की संभावना है।
शेयर बाजार पर असर
टैरिफ के ऐलान के बाद फर्नीचर और फार्मा सेक्टर के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। नीलकमल के शेयर 1% गिरकर लगभग 1500 रुपये पर आ गए। गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के शेयर 1.54% तक नीचे गए, जबकि कैरीसिल के शेयर 9.5% गिरकर 768.15 रुपये पर पहुंच गए।
फार्मा सेक्टर को बड़ा झटका
फार्मा सेक्टर में सन फार्मा, नैट्को, अरविंदो, लुपिन और बायोकॉन जैसी कंपनियों का अमेरिका में बड़ा कारोबार है। 100% टैरिफ के ऐलान के बाद इस सेक्टर में अस्थिरता बढ़ गई है और निवेशक इन कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि जेनरिक दवाओं में काम करने वाली कंपनियों जैसे डॉ. रेड्डीज, लुपिन और अरविंदो पर इसका असर कम पड़ सकता है। बायोकॉन ने हाल ही में अमेरिका में नया प्लांट खोला है, जिससे वह इस टैरिफ से बच सकती है।
फर्नीचर एक्सपोर्ट पर 50% टैरिफ का असर
भारत फर्नीचर के बड़े निर्यातक देशों में शामिल है और अमेरिका इसका प्रमुख बाजार है। 2024 में भारत ने अमेरिका को लगभग 1.14 अरब डॉलर का फर्नीचर, लाइटिंग और प्रीफैब्रिकेटेड बिल्डिंग प्रोडक्ट्स का निर्यात किया। ट्रंप की नई नीति के बाद यह सेक्टर खासा प्रभावित हो सकता है।
प्रमुख प्रभावित कंपनियां
- Nilkamal Ltd: अमेरिका को 55-60 करोड़ रुपये का प्लास्टिक फर्नीचर भेजती है।
- Godrej Interio: अमेरिका में होम और ऑफिस फर्नीचर सप्लाई करती है।
- Carysil: अमेरिका से 21.5% आय आती है; सिंक और किचन एप्लायंसेज बनाती है।
- Featherlite Industries, Sheela Foam, Kurlon, Furniture Roots, Durian, Fashion Interior जैसी कई कंपनियां भी प्रभावित हो सकती हैं।
भारत के लिए रास्ता क्या है?
विश्लेषकों का सुझाव है कि भारत को नए निर्यात बाजारों की तलाश करनी चाहिए ताकि अमेरिका के टैरिफ के असर को कम किया जा सके।
आगे क्या हो सकता है?
विश्लेषकों का कहना है कि यह ट्रंप की चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। यदि वह 2024 में फिर से राष्ट्रपति बने, तो यह नीति और कड़ी हो सकती है, जिससे भारत और अन्य साझेदार देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ने की संभावना है।




