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सोने की झाड़ू, 56 भोग और लाखों श्रद्धालु: भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा शुरू

नोएडा: उड़ीसा के पुरी में आज एक बार फिर आस्था, परंपरा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। विश्वविख्यात जगन्नाथ रथ यात्रा का शुभारंभ हो गया है।

हर साल की तरह इस बार भी देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचे हैं, ताकि इस महायात्रा का हिस्सा बन सकें।

राजा बने भगवान के सेवक – ‘छेरा पहरा’ परंपरा

रथ यात्रा की शुरुआत होती है एक अनोखी और अत्यंत पवित्र परंपरा ‘छेरा पहरा’ से। पुरी के गजपति महाराज दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनकर भगवान के रथ की राह में सोने की झाड़ू से सफाई करते हैं।

वे रथ के नीचे झाड़ू लगाते हैं और चंदन जल व फूल छिड़कते हैं। यह परंपरा यह दर्शाती है कि भगवान के सामने सभी समान हैं – चाहे वे राजा ही क्यों न हों।

तीन रथ, तीन देवता

भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ यात्रा पर निकलते हैं। तीनों के लिए अलग-अलग रथ बनाए जाते हैं:

भगवान जगन्नाथ का रथ – नंदीघोष

बलभद्र का रथ – तालध्वज

सुभद्रा का रथ – दर्पदलन

हर साल लकड़ी से बनाए जाने वाले ये रथ शिल्पकला और रंगों का बेहतरीन उदाहरण होते हैं। हर रथ की बनावट और सजावट एक-दूसरे से अलग होती है।

भगवान की मौसी के घर विश्राम

तीनों रथों की यात्रा करीब 3 किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर तक होती है, जिसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। यहां भगवान एक हफ्ते तक विश्राम करते हैं। इस दौरान उन्हें 56 प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं – जिनमें खिचड़ी, सब्ज़ी, मिठाई और अन्य पकवान शामिल हैं।

चाक-चौबंद सुरक्षा इंतज़ाम

लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए प्रशासन की ओर से पुख्ता इंतज़ाम किए गए हैं। पुलिस, NDRF की टीमें और मेडिकल स्टाफ लगातार तैनात रहते हैं। रथ यात्रा मार्ग पर ड्रोन से निगरानी की जाती है और जगह-जगह CCTV कैमरे लगाए गए हैं ताकि कोई भी असुविधा न हो।

निष्कर्ष: आस्था का महापर्व

जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, समर्पण और समता का जीवंत उदाहरण है – जहां भगवान खुद भक्तों के बीच आते हैं और हर वर्ग को अपने करीब लाते हैं।

Divya Gupta

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