Noida: स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को आकार देने वाले राम सुतार ने दुनिया से कहा अलविदा, दिग्गजों ने दी श्रद्धांजलि
राम वनजी सुतार भारत के उन महान कलाकारों में शामिल थे, जिन्होंने अपनी मूर्तिकला से देश को वैश्विक पहचान दिलाई। उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री (1999) और पद्म भूषण (2016) से सम्मानित किया गया था।

विश्वविख्यात मूर्तिकार और स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के शिल्पकार राम वनजी सुतार के निधन से कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर है। उनके निधन पर प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनके निवास स्थान सेक्टर-19 नोएडा पहुंचकर परिजनों से मुलाकात की और श्रद्धांजलि दी।
राम वनजी सुतार भारत के उन महान कलाकारों में शामिल थे, जिन्होंने अपनी मूर्तिकला से देश को वैश्विक पहचान दिलाई। उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री (1999) और पद्म भूषण (2016) से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार द्वारा उन्हें महाराष्ट्र भूषण से सम्मानित किया गया। शोक संवेदना व्यक्त करने जिलाधिकारी मेधा रूपम, डीसीपी नोएडा यमुना प्रसाद, अपर जिलाधिकारी प्रशासन मंगलेश दुबे, एसीपी नोएडा प्रवीण कुमार सिंह और उप जिलाधिकारी दादरी अनुज नेहरा आदि मौजूद रहे।
राम वनजी सुतार के निधन से कला जगत में एक युग का अंत हो गया है। 100 वर्ष की आयु पूरी कर चुके राम सुतार ने 17 दिसंबर, 2025 की मध्यरात्रि को नोएडा स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। पूरे राजकीय सम्मान और नम आंखों के बीच उनका अंतिम संस्कार किया गया। राम सुतार का जन्म 19 फरवरी, 1925 को महाराष्ट्र के धुले जिले के गोंडूर गांव में हुआ था। उन्होंने मुंबई के प्रसिद्ध जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से शिक्षा प्राप्त की और अपने सात दशक से लंबे करियर में भारतीय मूर्तिकला को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल हैं, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, गुजरात में स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा, जो दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। संसद के बाहर ध्यानमग्न मुद्रा में बैठी गांधीजी की प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा मध्य प्रदेश के गांधी सागर बांध पर स्थित 45 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा है, उन्होंने डॉ. बीआर अंबेडकर, छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराजा सुहेलदेव सहित सैकड़ों महापुरुषों की प्रतिमाएं बनाईं।
राम सुतार जी ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका, फ्रांस और इटली सहित दुनिया के कई देशों में महात्मा गांधी की प्रतिमाएं स्थापित कर भारत का नाम रोशन किया। 100 वर्ष की आयु में भी वे सक्रिय थे और कई बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहे थे।




